अस्ति सकलत्रिभुवनललामभूता,प्रसवभूमिरिव कृतयुगस्यात्मनिवासोचिता भगवता महाकालाभिधानेन भुवनत्रयसर्गस्थितिसंहारकारिणाप्रमथनाथेनेववापरेव••••विजितामरलोकद्युतिरवन्तीषूज्जयिनी नाम नगरी।

उपन्यासकार बाणभट्ट ,620 ईस्वी की कृति कादम्बरी में उल्लेखित उज्जयिनीवर्णन पर आधृत

 


तीनों लोकों में सबसे रमणीय
कोई जगह है अभी
तो वह उज्जयिनी है,कोई और नहीं।
सतयुग शायद यहीं जन्मा,
महाकाल ने बनाई अपने निवास के निमित्त
यह एक नई पृथ्वी,
पशुपति की नृत्यक्रीडा सी थिरकती उज्जयिनी
मन मोह लेती है विद्याधरों का।

श्वेत रंग से पुती हुई ऊँची-ऊँची अटारियाँ,
सुवर्ण का चूर्ण बिखरा हुआ चहुँ ओर बालुका की तरह,
और उस पर बिछे हुए
शंख-शुक्ती-मुक्ता-प्रवाल-मरकतमणि।

सुर-असुर-सिद्ध-गन्धर्व के चित्रों से सजी वीथिकाएँ
अनवरत उत्सवता में डूबी हुई,
जगह-जगह विद्वत्सभाएँ,रंगशाला, अतिथिशालाएँ,
सुंदर कूप,तडाग,मनोरम देवालय,
आकाश से उतरती रहती दिव्य विमानपंक्तियाँ
यहाँ की सुंदर रमणियों के दर्शन मात्र के लिये।

लोग यहाँ पर दानी,उदारचरित,
उज्ज्वल वस्त्र पहने हुए,
हँसते-बोलते,
काम-अर्थ में लिप्त होकर भी धर्मनिष्ठ।
सुना है ऐसा कभी?
सब देशों की भाषाएँ सीखे हुए,
हिमालय के कानन की तरह
भीतर से सरल,
निपुण,कलाजीवी।
इतने अच्छे सब लोग
कि लगती है यह नगरी कल्पवृक्ष सी चित्तरंजिनी।

चौरस्ते
हिमगिरि जैसे शिखरों वाले मंदिरों से सजे हुए,
हरे-भरे उपवन,
जल की फुहारों से बनती हुई बदलियाँ,
केवड़े के पराग से सुगंधित जिसका पोर-पोर,
मतवाले भ्रमर गुनगुनाते घनी अमराइयों में,
कामदेव की पूजा के निमित्त
घर-घर लहराती रेशमी लाल पताकाएँ,
जिन पर मूंगे के मकरचिन्ह।

स्थायी इन्द्रधनुष खिंचा हुआ आकाश में,
वैदिक घनपाठ,पदपाठ के आरोहअवरोह में
उमगती पवित्र शिप्रा
संचित कलुष को समेट कर बहाती हुई,
मृदंगनाद-शंखध्वनि,
नृत्यपरायण मदोन्मत्त मयूरों का कोलाहल,
कदलीवन में किसी तरुण का वेणुवादन।

यत्र-तत्र रम्य सरोवर,
जहाँ खिले हुए अगणित नीलोत्पल,
दिशा-दिशा में हाथीदाँत के सुघड़ झरोखे,
झरोखे में से झाँकती मालविकाएँ।

आशुतोष की जटाओं पर चढी बैठी
गंगा को देखकर
ईर्ष्या से भरी शिप्रा की
तरंग-भृकुटियाँ तनी हुई।

डॉ. मुरलीधर चाँदनीवाला

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