altAqfpdCz0E82WmmbTsiWZ0KYRkpOQ4Vyor6mdYqWNg17wमान्यता है कि महाकाल सवारी के जरिए अपनी प्रजा का हाल जानने निकलते हैं क्योंकि महाकाल को उज्जैन का राजा माना जाता है। सवारी से पहले पुजारी मुघौटे सम्मुख रख महाकाल से इनमें विराजित होने का आह्वान करते हैं। पश्चात सवारी निकलती है। ऐसा इसलिए ताकि हर रूप में हर भक्त भगवान के दर्शन कर सके। खासकर वे जो वृद्ध, रुग्ण या नि:शक्तता की स्थिति में मंदिर नहीं आ सकते।

श्रावण-भादौ मास में भगवान महाकाल हर सोमवार को विभिन्न रूपों में विविध वाहनों पर सवार होकर भक्तों को दर्शन देने निकलते हैं। भक्त इन रूपों की एक झलक पाकर ही निहाल हो जाते हैं। पहले सोमवार को पालकी में चंद्रमौलेश्वर निकलते हैं। दूसरी सवारी में चंद्रमौलेश्वर हाथी पर और पालकी में मनमहेश विराजते हैं। इसके बाद क्रमश: नंदी पर उमा-महेश, गरुड़ पर शिव-तांडव, बैल जोड़ी पर होलकर, जटशंकर रूप में भगवान दर्शन देते हैं।

पालकी में भगवान के नगर भ्रमण की परंपरा अनादिकाल से मानी गई है। सिंधिया स्टेट के समय अन्य रूपों को सवारी में शामिल किया गया। प्रजा अपने राजा से मिलने के लिए इस कदर बेताब होती है कि शहर के चौराहे-चौराहे पर स्वागत की विशेष तैयारी की जाती है। शाम चार बजे राजकीय ठाट-बाट और वैभव के साथ राजा महाकाल विशेष रूप से फूलों से सुसज्जित चाँदी की पालकी में सवार होते हैं। जैसे ही राजा महाकाल पालकी में विराजमान होते हैं। ठंडी हवा के एक शीतल झोंके से या हल्की फुहारों से प्रकृति भी उनका भीना स्वागत करती है स्थानीय प्रचलित भाषा में इसे सावन के ‘सेहरे’ कहा जाता है ।