भोले बाबा तो ‘आशुतोष’ अर्थात शीघ्र प्रसन्न होने वाले हैं | भक्त शिव को प्रसन्न करने के लिए उनका जलाभिषेक करते है | सावन मास के शुरू होते ही कांवड़ यात्रा का भी आरंम्भ हो जाती है.इस यात्रा मे शिव भक्त जिन्हे कांवडीया भी कहा जाता है,भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए हरिद्वार या गंगोत्री से गंगा जल अथवा अपने शहर के आस पास की नदियों अथवा तालाब से जल ऊठा कर एक लम्बी पैदल यात्रा पर निकल पडते है,चाहे कितने भी कष्ट हो उनको पर वह शिव भक्ति मे लीन होकर सब सहते हुए,चलते रहते है, ओर सावन मास की शिवरात्री पर भगवान(शंकर) आशुतोष का जलाभिषेक करते है.

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शिव को जल क्यो चढाया जाता है इस पर कई मत है,पहला की ऐसा मानना है की समुंद्र मंथन सावन के महिने मे ही हुआ था ओर जब समुंद्र मँथन के दौरान हलाहल नामक विष निकल आया जो समस्त संसार का नाश कर देता तब भगवान शिव ने ही आगे बढकर उस विष को पी लिया ओर अपने कण्ठ मे जमा कर लिया जिस कारण उनका कण्ठ नीला पड गया ओर वह नीलकण्ठ महादेव ने नाम से भी जाने गये.

विष की गर्मी के काऱण उनके मुख से राम राम की जगह बम बम की आवाज निकली चालू हो गई इसलिए सभी देवताओ ने गंगा मां का जल लेकर शिव के मस्तक पर जल डाला, जिससे शिव को शान्ति मिली. इसलिए ही सावन के महिने मे गंगाजी के जल से शिव का जलाभिषेक किया जाता है ओर यही से कांवड यात्रा की शुरूआत हुई

दूसरी यह है की श्रवण कुमार भी सावन के महिने मे ही कांवड़ बना कर अपने अंधे माता पिता को तीर्थ यात्रा पर ले गये थे ओर उन्होने शिव का जलाभिषेक भी किया था.