भर्तृहरि
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भर्तृहरि
लौट-लौट आते हैं
अवन्ती में,
खड़े होते हैं कल्पलता के नीचे
कभी मौन,कभी मुखर।
वैराग्य के जंगल में
महाकाल-वन नहीं होता,
शिप्रा नहीं होती,
सौधोत्संग नहीं होते,
पौरांगनाएँ नहीं होतीं।
उठ-उठ खड़े होते हैं वैराग्य में
नीतिशतक के भाषित,
कोई श्रावक नहीं होता वहाँ
कोई ग्राहक नहीं मिलते,
जीवन का श्रृंगार
खिसक आता है चुपके से
फिर अवन्ती में।

भर्तृहरि राजा हैं अपने जीवन के,
कवीश्वर हैं रससिद्ध,
ठाठ-बाट से सुनते हैं अनहद
शून्य के एकान्त में,
ठाठ-बाट से लौटकर आते हैं
अंतःपुर में
नर्तकों की टोली से घिरे हुए।
जाने कब बन जाते हैं
सरल-तरल भिक्षु
हाथ फैलाये हुए।

भर्तृहरि गाना चाहते हैं
प्रेम-कविताएँ,
कातना चाहते हैं
दु:ख-सुख से भरे कथानक का प्रेमसूत्र,
लगे हाथ सुनाना चाहते हैं
पीली पड़ चुकी विलासलक्ष्मी की
त्रासद कथा भी।

भर्तृहरि
लौट-लौट आते हैं
अवन्ती में,
यहाँ उन्हें विक्रम मिलते हैं,
बाण मिलते हैं,
मिलते हैं भास,कालिदास,
शूद्रक,वराहमिहिर,
इन सबके साथ
घूमता हुआ जीवन का सुवर्ण-चक्र
और उसका व्याकरण भी।

यहाँ सुनते हैं शून्य में वे
योगियों का प्रणवगान,
देखते हैं शिप्रा के रम्य तट पर
ताण्डव कभी,कभी लास्य भी।
नृत्यशाला में घूम आते हैं
मृदंग लेकर
नर-नारियों के साथ,
कभी जा बैठते हैं सावधान
नाथ-समुदाय में,
मंत्रसिद्धि,रससिद्धियाँ बटोर लाते हैं
अपनी प्यारी जनता के लिये।

कहते हैं ,
भर्तृहरि प्रतिदिन लाते हैं
जल भरकर कोटितीर्थ से
ब्राह्मवेला में,
अवन्तीनाथ का अभिषेक कर
लौट जाते हैं अपनी गुहा में।