mahakal-temple-ujjainभूतभावन महामृत्युंजय तीनों लोक (आकाश, पाताल और मृत्युलोक ) के अधिपति बाबा महाकालेश्वर की पावन नगरी उज्जयनी जिसकी ख्याति कालजयी अर्थात जहाँ के स्मरण मात्र से ही काल पर विजय प्राप्त हो जाती है ऐसी नगरी के रूप में प्रसिद्ध है । पौराणिक मान्यताओं के अनुसार उज्जयनी सृष्टि की रचना केन्द्र भी है, प्रत्येक कल्प में सृष्टि का आरम्भ यही से होता है। मोक्षप्रदायिनी  माँ क्षिप्रा के सुरम्य तट पर बसी उज्जयनी के प्राण क्षिप्रा के कलकल निनाद से स्पंदित होते है । स्कन्द पुराण में क्षिप्रा के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा है कि –

नास्ति वत्स महिपृष्ठे सिप्रायाः सदृशी नदी । यस्यास्तीरे क्षणान्मुक्तिः किं चिरात्सवनेवौ ।

“पृथ्वी पर क्षिप्रा के समान अन्य कोई नदी नहीं है, इसके स्मरण मात्र से ही सारे पाप तो नष्ट होते ही है साथ ही पावन स्पर्श से मोक्ष प्राप्त कर मनुष्य अमरत्व को प्राप्त कर लेता है”

 

वर्तमान उज्जैन नगर विंध्यपर्वतमाला के समीप और पवित्र तथा ऐतिहासिक क्षिप्रा नदी के किनारे समुद्र तल से 1678 फीट की ऊंचाई पर 23डिग्री.50′ उत्तर देशांश और 75डिग्री .50′ पूर्वी अक्षांश पर स्थित है। उज्जैन भारत के मध्य प्रदेश राज्य का एक प्रमुख शहर है जो क्षिप्रा नदी के किनारे बसा है। कालगणना के क्षेत्र में उज्जैन नगर का योगदान अविस्मरणीय है। स्टैण्डर्ड टाइम के लिए आज जो महत्ता ग्रीनविच की है, वही कभी उज्जैन की थी।| यह एक अत्यन्त प्राचीन शहर है। यह विक्रमादित्य के राज्य की राजधानी थी। इसे कालिदास की नगरी के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ हर १२ वर्ष पर सिंहस्थ कुंभ मेला लगता है। भगवान शिव के १२ ज्योतिर्लिंगों में एक महाकाल इस नगरी में स्थित है। उज्जैन मध्य प्रदेश के सबसे बड़े शहर इन्दौर से ५५ कि मी पर है। उज्जैन के प्राचिन नाम अवन्तिका, उज्जयनी, कनकश्रन्गा आदि है। उज्जैन मन्दिरो की नगरी है। यहा कई तीथ‍ स्थल है।

नामकरण 
उज्जयिनी का शाब्दिक अर्थ है विजेता या जयनगरी। कहा जाता है कि प्राचीनकाल में त्रिपुर नामक दानव ने ब्रह्मा से वरदान प्राप्त कर देवताओं को परेशान करने लगा। देवताओं ने शिव के कथनानुसार रक्तदन्तिका चण्डिका देवी की अराधना कर उन्हें प्रसन्न किया। देवी ने प्रसन्न होकर शंकर को महापाशुपत अस्र दिया, जिसके द्वारा उन्होंने उस मायावी त्रिपुर को तीन खण्डों में काट दिया, इस प्रकार त्रिपुर को उज्जिन ( बुरी तरह से पराजित ) किया गया। इस प्रकार इस स्थान का नाम उज्जयिनी पड़ा।

अवंति का नामाकरण के बारे में सनत कुमार ने उल्लेख किया है कि प्राचीन ईशान कल्प में जब दानवों ने देवगणों को पराजित कर दिया, तब वे सुमेरु शिखर पर एकत्रित हो गये। वहीं उन्हे आकाशवाणी सुनाई पड़ी कि वे सभी कुशीस्थल जाएँ, वहीं उनके समस्या का समाधान होगा। जब वे कुशीस्थल गये, तो पाया कि वहाँ सभी लोग सदाचारी है, ॠषि गंधर्व तपस्यारत रहते हैं। सभी जगह सुख- शान्ति है। वहाँ के अनेक तीर्थों मे स्नानादि कर वे विगत कल्मष हुए तथा पुनः स्वर्ग को प्राप्त कर सके। चूँकि प्रत्येक कल्पों में यह स्थान देवता, तीर्थ, औधषि तथा प्राणियों का रक्षण ( अपन ) करती आयी है। अतः इसे अवंति के नाम से जाना गया।
अन्य नाम 
वर्तमान नाम उज्जैन उज्जयिनी का ही अपभ्रंश है। पालिग्रंथों में इसका नाम उज्जैनी है, वहीं प्राकृत ग्रंथ इसे उजेनी लिखते हैं। रोमन इतिहासकार टॉलेमी इस स्थान का उल्लेख “ओजन’ नाम से करता है। इसके अतिरिक्त इस नगर के कई अन्य नाम भी हैं — सुवर्णश्रृंगार, कुशस्थली, अवन्तिका, अमरावत, चूड़ामणि, पद्मावती, शिवपुरी, कुमुद्वती आदि। बोधम्यन धर्मसुत्र में इसका अवन्ति नाम आया है, वहीं स्कंदपुराण का एक भाग अवन्ति- खण्ड के नाम से प्रसिद्ध है। वाल्मीकि ने अपनी रामायण में अवन्ति- राष्ट्र की चर्चा की है।

उज्जैन का राजनैतिक इतिहास काफी लम्बा रहा है। उज्जैन के गढ़ क्षेत्र से हुयी खुदाई में आद्यैतिहासिक (protohistoric ) एवं प्रारंभिक लोहयुगीन सामग्री प्रचुर मात्रा में प्राप्त हुई है। पुरानों व महाभारत में उल्लेख आता है की वृष्णि-वीर कृष्ण व बलराम यहाँ गुरु सांदीपनी के आश्रम में विद्याप्राप्त करने हेतु आये थे। कृष्ण की एक पत्नी मित्रवृन्दा उज्जैन की ही राजकुमारी थी। उसके दो भाई विन्द एवं अनुविन्द महाभारत युद्ध में कौरवों की और से युद्ध करते हुए वीर गति को प्राप्त हुए थे। ईसा की छठी सदी में उज्जैन में एक अत्यंत प्रतापी राजा हुए जिनका नाम चंड प्रद्योत था। भारत के अन्य शासक उससे भय खाते थे। उसकी दुहिता वासवदत्ता एवं वत्सनरेश उदयन की प्रणय गाथा इतिहास प्रसिद्द हैv प्रद्योत वंश के उपरांत उज्जैन मगध साम्राज्य का अंग बन गया।

महाकवि कालिदास उज्जयिनी के इतिहास प्रसिध्द सम्राट विक्रमादित्य के दरबार के नवरत्नों में से एक थे। इनको उज्जयिनी अत्यंत प्रिय थी। इसीलिये कालिदास ने उज्जयिनी का अत्यंत ही सुंदर वर्णन किया है। सम्राट विक्रमादित्य ही महाकवि कालिदास के वास्तविक आश्रयदाता के रूप में प्रख्यात है।

महाकवि कालिदास की मालवा के प्रति गहरी आस्था थी। उज्जयिनी में ही उन्होंने अत्यधिक प्रवास-काल व्यतीत किया और यहींपर कालिदास ने उज्जयिनी के प्राचीन एवं गौरवशाली वैभव को देखा। वैभवशाली अट्टालिकाओं, उदयन, वासवदत्ता की प्रणय गाथा, भगवान महाकाल संध्याकालीन आरती तथा नृत्य करती गौरीगनाओं के सात ही क्षिप्रा नदी का पौराणिक महत्व आदि सेभली भांति परिचित होने का अवसर भी प्राप्त किया हुआ जान पडता है।

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‘मेघदूत’ में महाकवि कालिदास ने उज्जयिी का सुंदर वर्णन करते हुए कहा है किजब स्वर्गीय जीवों को अपने पुण्यक्षीण होने की स्थिति में पृथ्वी पर आना पत्रडा। तब उन्होंने विचार किया कि हम अपने साथ स्वर्ग का एक खंड (टुकत्रडा) भी ले चले। वही स्वर्गखंड उज्जयिनी है। आगे महाकवि ने लिखा है कि उज्जयिनी भारत का वह प्रदेश है जहां के वृध्दजनइतिहास प्रसिध्द आधिपति राजा उदयन की प्रणय गाथा कहने में पूर्ण दक्ष है।

कालिदास के ‘मेघदूत’ में उज्जयिनी का वैभव आज भले ही विलप्त हो गया हो परंतु आज भी विश्व में उज्जयिनी का धार्मिक-पौराणिक एवं ऐतिहासिक महत्व के सात ही ज्योतिक्ष क्षेत्र का महत्व भी प्रसिध्दहै। उज्जयिनी भारत की सात पुराण प्रसिध्द नगरियों में प्रमुख स्थान रखती है। उज्जयिनी में प्रति बारह वर्षों में सिंहस्थ महापर्व का आयोजन होता है।इस अवसर पर देश-विदेश से करोत्रडों श्रध्दालु भक्तजन, साधु-संत, महात्मा महामंडलेश्वर एवं अखात्रडा प्रमुख उज्जयिनी में कल्पवास कर मोक्ष प्राप्ति की मंगल कामना करते हैं।

प्रमाणिक इतिहास

उज्जयिनी की ऐतिहासिकता का प्रमाण ई.सन600 वर्ष पूर्व मिलता है। तत्कालीन समय में भारत में जो सोलह जनपद थे उनमें अवंति जनपद भी एक था। अवंति उत्तर एवं दक्षिण इन दो भागों में विभक्त होकर उत्तरी भाग की राजधानी उज्जैन थी तथा दक्षिण भाग की राजधानी महिष्मति थी। उस समय चंद्रप्रद्योत नामक सम्राट सिंहासनारूत्रढ थे। प्रद्योत के वंशजों का उज्जैन पर ईसा की तीसरी शताब्दी तक प्रभुत्व था।

मौर्य साम्राज्य
मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य यहाँ आया था. उसका पुत्र अशोक यहाँ का राज्यपाल रहा था। उसकी एक भार्या वेदिसा देवी से उसे महेंद्र और संघमित्रा जैसी संतान प्राप्त हुई जिसने कालांतर में श्रीलंका में बौद्ध धर्म का प्रचार किया था. मौर्य साम्राज्य के अभुदय होने पर मगध सम्राट बिन्दुसार के पुत्र अशोक उज्जयिनी के समय नियुक्त हुए। बिन्दुसार की मृत्योपरान्त अशोक ने उज्जयिनी के शासन की बागडोर अपने हाथों में सम्हाली और उज्जयिनी का सर्वांगीण विकास कियां सम्राट अशोकके पश्चात उज्जयिनी ने दीर्घ काल तक अनेक सम्राटों का उतार चढाव देखा।

मौर्य साम्राज्य का पतन
मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद उज्जैन शकों और सातवाहनों की प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन गया। शकों के पहले आक्रमण को उज्जैन के वीर विक्रमादित्य के नेतृत्व में यहाँ की जनता ने प्रथम सदी ईसा पूर्व विफल कर दिया था। कालांतर में विदेशी पश्चिमी शकों ने उज्जैन हस्त गत कर लिया। चस्टान व रुद्रदमन इस वंश के प्रतापी व लोक प्रिय महाक्षत्रप सिद्ध हुए।

गुप्त साम्राज्य
चौथी शताब्दी ई. में गुप्तों और औलिकरों ने मालवा से इन शकों की सत्ता समाप्त कर दी। शकों और गुप्तों के काल में इस क्षेत्र का अद्वितीय आर्थिक एवं औद्योगिक विकास हुआ। छठी से दसवीं सदी तक उज्जैन कलचुरियों, मैत्रकों, उत्तरगुप्तों (Later Guptas) पुष्यभूतियों, चालुक्यों, राष्ट्रकूटों व प्रतिहारों की राजनैतिक व सैनीक स्पर्धा का दृश्य देखता रहा।

सातवीं शताब्दी में उज्जैन कन्नौज के हर्षवर्धन साम्राज्य में विलीन हो गया। उस काल में उज्जैन का सर्वांगीण विकास भी होता रहा। सन् ६४८ ई. में हर्ष वर्धन की मृत्यु के पश्चात नवी शताब्दी तक उज्जैन परमारों के आधिपत्य में आया जो गयारहवीं शताब्दी तक कायम रहा इस काल में उज्जैन की उन्नति होती रही। इसके पश्चात उज्जैन चौहान और तोमर राजपूतों के अधिकारों मे आ गया।

सन १००० से १३०० ई. तक मालवा परमार-शक्ति द्वारा शासित रहा। काफी समय तक उनकी राजधानी उज्जैन रही. इस काल में सीयक द्वितीय, मुंजदेव, भोजदेव, उदयादित्य, नरवर्मन जैसे महान शासकों ने साहित्य, कला एवं संस्कृति की अभूतपूर्व सेवा की.

दिल्ली सल्तनत
दिल्ली के दास एवं खिलजी सुल्तानों के आक्रमण के कारण परमार वंश का पतन हो गया। सन् १२३५ ई. में दिल्ली का शमशुद्दीन इल्तमिश विदिशा विजय करके उज्जैन की और आया यहां उस क्रूर शासक ने ने उज्जैन को न केवल बुरी तरह लूटा अपितु उनके प्राचीन मंदिरों एवं पवित्र धार्मिक स्थानों का वैभव भी नष्ट किया। सन १४०६ में मालवा दिल्ली सल्तनत से मुक्त हो गया और उसकी राजधानी मांडू से धोरी, खिलजी व अफगान सुलतान स्वतंत्र राज्य करते रहे। मुग़ल सम्राट अकबर ने जब मालवा पर किया तो उज्जैन को प्रांतीय मुख्यालय बनाया गया. मुग़ल बादशाह अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ व औरंगजेब यहाँ आये थे।

मराठों का अधिकार
सन् १७३७ ई. में उज्जैन सिंधिया वंश के अधिकार में आया उनका सन १८८० ई. तक एक छत्र राज्य रहा जिसमें उज्जैन का सर्वांगीण विकास होता रहा। सिंधिया वंश की राजधानी उज्जैन बनी। राणोजी सिंधिया ने महाकालेश्वर मंदिर का जीर्णोध्दार कराया। इस वंश के संस्थापक राणोजी शिंदे के मंत्री रामचंद्र शेणवी ने वर्तमान महाकाल मंदिर का निर्माण करवाया. सन १८१० में सिंधिया राजधानी ग्वालियर ले जाई गयी किन्तु उज्जैन का संस्कृतिक विकास जारी रहा। १९४८ में ग्वालियर राज्य का नवीन मध्य भारत में विलय हो गया।

उज्जयिनी में आज भी अनेक धार्मिक पौराणिक एवं ऐतिहासिक स्थान हैं जिनमें भगवान महाकालेश्वर मंदिर, गोपाल मंदिर, चौबीस खंभा देवी, चौसठ योगिनियां, नगर कोट की रानी, हरसिध्दिमां, गत्रढकालिका, काल भैरव, विक्रांत भैरव, मंगलनाथ, सिध्दवट, बोहरो का रोजा, बिना नींव की मस्जिद, गज लक्ष्मी मंदिर, बृहस्पति मंदिर, नवगृह मंदिर, भूखी माता, भर्तृहरि गुफा, पीरमछन्दर नाथ समाधि, कालिया देह पैलेस, कोठी महल, घंटाघर, जन्तर मंतर महल, चिंतामन गणेश आदि प्रमुख हैं।