वीर दुर्गादास की छतरी, मंदिरों उज्जैन के शहर में स्थित एक विशिष्ट स्मारक है। यह स्मारक छतरी के रूप में वीर दुर्गादास की याद में बनवाया गया था जो राजपूताना इतिहास में एक महान शख्सियत है। वीर दुर्गादास ने महाराज जसवंत सिंह की मृत्यु के बाद मुग़लों से लड़ाई की और औरंगज़ेब की इच्छा के विरुद्ध जोधपुर पर चढ़ाई करने में अजीत सिंह की सहायता की।

वीर दुर्गादास की मृत्यु उज्जैन में 22 नवम्बर, 1718 को हुई, उनकी इच्छा थी कि उनका दाह संस्कार शिप्रा नदी के किनारे किया जाए। वीर दुर्गादास की मृत्यु के बाद जोधपुर के शासकों द्वारा उसकी याद में शिप्रा नदी के तट पर यह छतरी बनवाई जो राजपुर घराने के आर्कीटेक्चर को दर्शाता एक दर्शनीय स्थल है। वीर दुर्गादास की छतरी 18वीं शताब्दी का एक विशिष्ट स्मारक है, जिसको राज्य पुरातत्व द्वारा 1979 में संरक्षित किया गया है।

कौन थे वीर दुर्गादास राठौड़?

13 अगस्त, 1638 को महाराजा जसवंसिंह प्रथम के मंत्री आसकरण के यहाँ मारवाड़ा के सालवा गाँव में हुआ। महाराजा जसंवतसिंह के देहान्त के बाद राजकुमार अजीतसिंह की रक्षा व उन्हें जोधपुर को राज्य पुनः दिलाने में वीर दुर्गादास राठौड़ का महती योगदान रहा। इन्होंने अनेक कष्ट सहते हुए भी कुंवर अजीत सिंह की परवरिश की एवं अंत में उन्हें जोधपुर का शासन दिलवाया।

राजस्थान के इतिहास में मेवाड़ की पन्ना धाय के पश्च्यात वीर दुर्गादास दूसरे व्यक्ति है। जिनकी स्वामीभक्ति अनुकरणीय है। उन्होंने जीवन भर अपने स्वामी मारवाड़ के महाराजाओं की सेवा की । ऐसे साहसी, वीर और कूटनीतिज्ञ के कारण ही मारवाड़ का राज्य स्थाई रूप से मुगल साम्राज्य का अंग नहीं बन सका।

वीर दुर्गादास के लिए कहा जाता है कि- ‘मायड एडो पूत जण, जाडो दुर्गादास ! ‘