उज्जयिनी के चौरासी महादेव मन्दिर
उज्जयिनी अनादि नगरी है, ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर, उत्तरवाहिनी पुण्यप्रदा शिप्रा की नगरी है और एक समृध्द तथा प्रेरक संस्कृति का पोषण करने वाली नगरी के रूप में प्रारम्भ से ही प्रणम्य रही है। भक्ति-शक्ति, विद्या-बुध्दि और सत्य-न्याय आदि की प्रधानता से इस नगरी की कीर्ति-कौमुदी चतुर्दिक फैली हुई है और यही कारण है कि पृथ्वीलोक की सात पुण्य पवित्र नगरियों में उज्जयिनी की अपनी विशेष महत्ता है। निश्चित ही यह महत्ता जहाँ अखण्डमण्डलाधीश भगवान महाकालेश्वर की सतत् मौजूदगी से है वहीं यहाँ के कण-कण में व्याप्त शिव तत्व के कारण भी है।

आज की उज्जयिनी पुराणों में महाकाल वन के नाम से अभिहित की गयी है, जिसका विस्तार एक योजन पर्यन्त तक था। कहते हैं, यहाँ शंकर के सहस्त्रों लिंग थे, जिनकी गणना नहीं की जा सकती थी। स्कन्दपुराण के अवन्ति-खण्ड में इस नगरी के प्रमुख चौरासी लिंगों की महिमा तथा उनकी पूजा से मिलने वाले फलों का विस्तार से वर्णन किया गया है। यह भी मान्यता है कि यहाँ चौरासी कल्प बीत चुके हैं और इन कल्पों के प्रतिनिधि रूप में ही ये लिंग यहाँ प्रतिष्ठित हैं। इन्हें सिध्द लिंग अथवा योग लिंग के साथ-साथ ईश्वर भी कहा गया है। ये चौरासी महादेव इस उज्जयिनी में मन्दिरों में विद्यमान है तथा श्रध्दालुओं के पुण्यों का उदय करते रहे हैं।

स्कंदपुराण के अनुसार अहिवलयाकार क्षेत्र की रचना से वेष्ठित भू-भाग पर श्री महाकाल का निवास माना गया है। अहिवलय का ज्योतिष में विशेष महत्व है। वैसे भी उज्जयिनी में 28 तीर्थ प्रमुख हैं जो 28 नक्षत्रों के प्रतीक भी है। प्रत्येक वलय में तीन-तीन महादेवों के मान से 28 वलयों में 84 महादेवों की पुण्यप्रदा शिप्रा के आस-पास मौजूदगी ही प्राणियों को 84 लाख योनियों से मुक्त करने का सामर्थ्य यहाँ प्राप्त करती है।

आने वाले दिनों में हम आपको एक एक करके ८४ महादेव मंदिरों और उनके महत्व के बारे में जान कारी देने का प्रयास करेंगे