निल बटे सन्नाटा मानक शब्द नहीं है। लेकिन कुछ न होने यानी शून्य की स्थिति पर यह कहावत खूब चलती है। चंदा सहाय (स्वरा भास्कर) का सपना है उसकी बेटी और उसकी बेटी अपेक्षा सहाय (रिया शुक्ला) का कोई सपना नहीं है। और इस सपने के होने न होने से के बीच ही यह फिल्म चलती है।

इस फिल्म की शुरुआत के थोड़ी देर बाद ही एक दिलचस्प दृश्य है। काम वाली बाई चंदा (स्वरा भास्कर) और उसकी मालकिन, जिसे वह दीदी कहती है (रत्ना शाह पाठक), के बीच। दीदी, चंदा से कहती है, इस दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं…एक किस्मत वाले और दूसरे मेहनत करने वाले। चंदा कहती है, किस्मत तो गरीब के पास होती नहीं…अब बची मेहनत…

ये फिल्म एक मां-बेटी, मालिकन-नौकरानी और एक स्कूल के प्रिंसिपल की भी बात करती है। न केवल बात करती है, बल्कि कुछ अच्छा सोचने और महसूस करने पर भी जोर देती है। ऐसी कहानियों के किरदार घर तक साथ जाते हैं और फिर छोटी-छोटी बातों पर अक्सर याद भी आते हैं। उम्मीदों और सपनों की इस कहानी में और भी बहुत कुछ है। आइये बताते हैं।

चंदा, आगरे की संकरी-गंदी गलियों से होते हुए बेनागा अपने काम पर जाती है। उसकी एक बेटी है अपेक्षा, जो अब दसवीं कक्षा में पहुंच गयी है। चंदा की चिंता है कि अपेक्षा पढ़ाई में बेहद कमजोर है और गणित में है उसका डब्बा गोल। ऊपर से उसका मन भी पढ़ाई में नहीं लगता। एक दिन जब चंदा, अपेक्षा से पूछती है कि वो बड़े होकर क्या बनना चाहती है तो वो तपाक से जवाब देती है- ‘काम वाली बाई’। चंदा सन्न रह जाती है।

चंदा अपनी ये चिंता दीदी से शेयर करती है, जो उसे अपेक्षा की कोचिंग लगवाने की सलाह देती है। पैसों की दिक्कत के चलते वहां भी बात नहीं बनती। चंदा को अफ़सोस  है कि अगर वह थोड़ी-सी और पढ़ी होती तो अपेक्षा को गणित पढ़ा सकती थी। नौवीं के बाद उसने पढ़ाई छोड़ दी थी। एक दिन दीदी की सलाह पर चंदा, अपेक्षा के ही स्कूल में दसवीं कक्षा में दाखिला ले लेती है। यहां उसका सामना गणित के अध्यापक एवं स्कूल प्रिंसिपल (पंकज त्रिपाठी) से होता है, जो नरम-गरम स्वभाव के हैं। अपनी मां का स्कूल में दाखिला लेना अपेक्षा को बिल्कुल नहीं भाता और यही बात मां-बेटी में तनाव का कारण बन जाती है, जो देखते ही देखते एक चुनौती में तब्दील हो जाती है।

अपेक्षा, चंदा को चुनौती देती है कि वो गणित में उससे ज्यादा नंबर लाकर दिखाएगी तो चंदा स्कूल जाना छोड़ देगी। होता भी कुछ ऐसा ही है, लेकिन अपेक्षा के दिमाग में तो कुछ और ही चल रहा था। चुनौती जीतने के बाद वह पढ़ाई फिर से छोड़ देती है और विद्रोही हो जाती है, ये देख चंदा टूट जाती है।

जैसा कि शुरुआत में कहा कि ये कहानी सपनों, उम्मीदों, किस्मत और मेहनत के बीच द्वंद का चित्रण करती है। साथ ही समाज के अलग-अलग तबकों से लोगों के बीच सौहार्द-प्यार को भी दर्शाती है। अच्छे अहसास के साथ कई बातें सिखाती भी है। बावजूद इसके कई बातें खटकती भी हैं, जो फिल्म के शिल्प से जुड़ी हैं। पर पहले बात करते हैं अभिनय और कहानी की, जिस पर सबसे ज्यादा फोकस किया गया है।

यह फिल्म पढ़ाई के प्रति अलख और चेतना जगाती है। भयावह दुनिया के बीच पता चलता है कि गणित की दुनिया कितनी आसान है। रिया शुक्ला ने पढ़ने में मन न लगने वाली बच्ची की भूमिका में जान डाल दी है। उनके चेहरे पर कई बार स्वरा से ज्यादा अच्छे तेवर दिखाई दिए हैं।

इसमें कई दो राय नहीं कि एक फिकरमंद और जुझारू मां के इस किरदार को स्वरा ने बड़ी मेहनत से अदा किया है। प्यार और गुस्से के पलों में उनके भाव हिचकोले खाते हैं, तो अच्छा लगता है। फीके-से कपड़े, बिखरे बाल और बेढंगी चाल से उन्होंने कामवाली बाई के चरित्र को भी खूब जीया है। पर कहीं कहीं उनकी बोली उनका साथ नहीं दे पाती। खासतौर से झल्लाने वाले दृश्यों में।

लेकिन दूसरी तरफ यही बात अपेक्षा के किरदार में एक साकारात्मक पहलू बनकर उभरती है। अपेक्षा जरूरत से ज्यादा मुंहफट और हठी है। ये अजीब लगता है कि वह अपनी मां को बेहद कम समय के लिए मां समझती है। उसे खुद को लगता है कि उसकी मां एक कामवाली बाई ही है। अपनी मां के लिए उसकी आंखों में प्यार कम झल्लाहट ज्यादा झलकती है। आदर का अभाव भी दिखता है। ये कुछ बातें इस फिल्म के संदेश को थोड़ा कमजोर तो बनाती ही हैं। फिर भी स्वरा और रिया के अभिनय की तारीफ तो बनती ही है।

दूसरे छोर पर पंकज त्रिपाठी और रत्ना शाह पाठक के किरदार भी बेहद मजेदार और दिलचस्प हैं। पंकज त्रिपाठी, में कुव्वत है कि वह चपरासी के साथ साथ टीचर का किरदार भी बखूबी निभा सकते हैं। उन्हें देख आपको सहज ही अपने किसी अध्यापक की याद आ जाएगी। और दिल ये भी कह उठेगा कि काश हमारे टीचर भी ऐसे होते…

दीदी और चंदा के बीच का रिश्ता अनोखा नहीं है, लेकिन ऐसे रिश्ते बेहद कम देखने को मिलते हैं। समाज को आज ऐसे आपसी प्यार की सख्त जरूरत है। खासतौर से अपेक्षा जैसे किसी बच्चे के लिए। उसकी मां के लिए, जो चाहती है कि उसकी बेटी पढ़-लिखकर एसपी बन जाए और नीली बत्ती की गाड़ी में घूमे। और इसी आस में वो एक दिन शहर के एसपी के घर तक पहुंच जाती है कि यह पद पाने के लिए क्या करना पड़ता है।

निर्देशक अश्वनी अय्यर तिवारी विज्ञापन फिल्में बनाने के लिए प्रसिद्ध हैं। पहली बार उन्होंने फीचर फिल्म निर्देशित की है। मां-बेटी के रिश्ते को उन्होंने बहुत ही खूबसूरती से दिखाया है। अश्विनी अय्यर तिवारी ने इस फिल्म से न केवल शिक्षा, बल्कि समाज के बीच पनपने वाली कुछ अच्छाईयों की तरफ भी इशारा किया है, इसलिए फिल्म में सामने आयी कुछ खटकने वाली बातों को थोड़ी देर भुलाकर इसे ‘फील गुड’ अहसास के लिए देखना तो बनता है।

सितारे : स्वरा भास्कर, रिया शुक्ला, रत्ना पाठक शाह, पंकज त्रिपाठी, संजय सूरी
निर्देशक : अश्विनी अय्यर तिवारी
निर्माता : सुनील ए. लुल्ला, आनंद एल. राय, नितेश तिवारी
कहानी : नितेश तिवारी
संवाद : अश्विनी अय्यर तिवारी, नीरज सिंह, प्रांजल चौधरी, नितेश तिवारी