सुप्रसिद्ध ज्योतिर्विद वराहमिहिर की बृहत्संहिता में एक उदकार्गल (जल की रुकावट) नामक अध्याय है। 125 श्लोकों के इस अध्याय में भूगर्भस्थ जल की विभिन्न स्थितियाँ और उनके ज्ञान संबंधी संक्षेप में विवरण प्रस्तुत किया गया है।

विभिन्न वृक्षों-वनस्पतियों, मिट्टी के रंग, पत्थर, क्षेत्र, देश आदि के अनुसार भूगर्भस्थ जल की उपलब्धि का इसमें अंदाज दिया गया है। यह भी बताया गया कि किस स्थिति में कितनी गहराई पर जल हो सकता है। फिर अपेय जल को शुद्ध कर कैसे पेय बनाया जाय, यह संकेत दिया गया है। इस विवरण के ज्ञान से भूगर्भस्थ जल को पाने का प्रयास किया जा सकता है। वराहमिहिर ने उनके समय प्रचलित लोकविश्वासों और अनुभवों की परख का सार लिखकर भावी जनता के लिए मार्गदर्शन किया है, जिससे विभिन्न क्षेत्रों के लोग भूगर्भस्थ जल का स्यवं ही परीक्षण कर सकें और तदनुसार कुएँ खोदकर जल प्राप्त करने का प्रयास कर सकें और उससे प्राणियों तथा फसलों के लिए पानी उपलब्ध करा सकें। इस विडियो में देखिये कैसे एक लकड़ी कि मदद से भूगर्भ के जल का पता लगाया जा रहा है |

ऐसे ही विभिन्न आधारों पर लोकानुभव के सार की समझ का ही परिणाम है कि प्राचीन काल के जो कुएँ बावड़ी आज उपलब्ध हैं उनमें अटूट जल पाया जाता है। परन्तु आज हम उनकी उपयोगिता की उपेक्षा करके पानी-पानी के लिए मोहताज होते जा रहे हैं। उधर पर्याप्त वर्षा के अभाव ने नयें पुराने कई वापी-कूपों को जीवनहीन कर दिया है। इधर उनके अखण्ड स्रोत के रूप में जो-जो नदी-तालाब थे उनका दोहन हो जाने से भी वे सूखते गये। अधिक गहाराई में जो जलस्रोत हैं उनका भी आज नलकूपों द्वारा दोहन हो जाने से भूगर्भस्थ जल का अभाव होता जा रहा है। इस प्रकार जलस्तर गिरता गया और गिरते जलस्तर के कारण पारम्परिक वृक्ष भी सूखते गये। यही नहीं कृषि-उपयोग या बढ़ती बस्तियों के लिए तथा लकड़ी के व्यवसायय ने वृक्षों की बेरहमी से कटाई इस तेजी से की कि वे पारम्परिक वृक्ष लुप्त हो गये। परिणामतः जिन वनस्पतियों के आधार परम्परा जल-स्थान बताती रही वे वनस्पतियाँ ही नहीं बचीं तो वहाँ जलबोध कैसे हो सकता है। तब भी अभी वनस्पतियाँ जहाँ बची हैं एवं मिट्टी, पत्थर आदि की पहचान से जलस्थिति का ज्ञान हो सकता है। यदि पुनः अच्छी वर्षा प्रतिवर्ष होती रहे, वन और वनस्पतियों की वृद्धि होती रहे तो वराहमिहिर के बताये लक्षणों के आधार पर भूगर्भस्थ जल स्थान और उसकी गहराई को जाना जा सकता है। वैसे भी ये लक्षण ऐसे हैं जो न केवल भारत अपितु विश्वभर में कहीं भी उपयोगी हो सकते हैं और इन लक्षणों के आधार पर विश्व में कहीं भी भूगर्भस्थ जल की प्राप्ति के प्रयास किया जा सकते हैं।

उसी ‘वृहत्संहिता का 53वाँ अध्याय है- ‘हकार्गल’ अर्थात अर्गला (छड़ी) के माध्यम से भूगर्भ के जल का पता लगाना। इस विधि के जानकार आज भी उपलब्ध हैं। इस अध्याय के कुछ अंश-

धर्म्य यशस्यं च वदाम्तोSहं दकार्गलं येन जलोपलब्धिः। पुंसां यथाड्गेषु शिरांस्तथैव क्षितावपि प्रोन्नत निम्न संस्थाः।।

मैं (वराहमिहिर) पुण्य और यश के देने वाले दकार्गल विज्ञान को जिससे भूमि में जल की प्राप्ति होती है, बताता हूँ। जिस प्रकार पुरुषों के अंगों में ऊपर और नीचे शिराएँ रहती है उसी प्रकार भूमि में ऊपर और नीचे (गहराई में) जल की शिराएँ होती हैं।

चिकने, लम्बी शाखाओं वाले, बहुत कम ऊँचे, बहुत न फैले हुए जो वृक्ष होते हैं वे सभी समीप जल वाले होते हैं, इनके पास (कम गहराई पर) जल रहता है। तथा जो वृक्ष सुषिर (जिनके पत्तों में छेद हों), जर्जर पत्र, रुखे होते हैं उनके पास (नीचे) जल नहीं होता।

जिस घास रहित प्रदेश में कुछ भूमि घास सहित तथा जिस घास सहित प्रदेश में कुछ भूमि घास रहित दिखाई दे तो उस स्थान पर नीचे जल की शिरा है, अर्थात जल है। उस स्थान पर नीचे धन है यह भी कहा जा सकता है।

किसी स्थान की सारी भूमि गर्म हो, परन्तु उसमें एक स्थान पर ठंडी हो जावे तो ठंडा पानी और सारी भूमि ठंडी हो और उसमें एक स्थान पर गर्म हो तो वहाँ गर्म पानी मिलता है (इन दोनों परिस्थितियों में) वहाँ साढ़े तीन पुरुष नीचे जल मिलता है।

जिस कम पानी वाली अथवा अधिक पानी वाली भूमि में इन्द्र (अर्जुन, देवदास या टुष्ज) धनु वृक्ष घनु, धन्वंग, गोलवृक्ष, घामिन-रर्क्ष मछली अथवा वाल्मी दिखाई दे वहाँ चार हाथ आगे, नीचे जल मिलता है।

जो भूमि सूर्य की गर्मी से भस्म, ऊँट (भूरि मिश्रित) और गधे के रंग के समान हो वह निर्जला होती है तथा जहाँ करीर वृक्ष (करील, केर, रेटी आदि) रक्ताकुर (लाल अंकुर युक्त हो और क्षीरयुत (दूधवाला) हो, भूमि रक्त (लाल) रंग की हो वहाँ पत्थर के नीचे जल निकलता है।

वह शिला जो कबूतर के रंग के समान है, शहद या घृत के रंग के समान है, या जो रेशमी वस्त्र के रंग के समान है, या जो सोमवल्ली (सोमलता, जिसका पत्ता तम्बाकू के पत्ते जैसे रंग का और फूल लाल रंग का होता है।) के रंग के समान है। ये सब अक्षय (कभी न समाप्त होने वाला) पानी सूचित करती हैं। इनके नीचे खोदने पर जल्दी पानी निकलता है।

जो शिला ताम्बे के रंग के तरह-तरह के धब्बों से युक्त हो तथा हल्के पीले रंग की हो या राख जैसे रंग वाली हो, या ऊँट और गधे (चटकीला नीला, बीच में केसरिया या सफेद) के रंग समान रंगवाली हो या भ्रमर के रंग के समान रंग वाली हो या अंगुठिष्का के पुष्प के सामान रंग वाली हो, जो सूर्य या अग्नि के समान रंग वाली हो, वह शिला पानी रहित होती है। इस प्रकार की शिलाओं के नीचे खोदने पर पानी नहीं मिलता।

‘बृहतसंहिता’नामक ग्रंथ के ‘कुसुमलता’नाम के अध्याय में वनस्पति शास्त्र और कृषि उपज के संदर्भ में जो जानकारी प्रदान की है उसमें शमीवृक्ष अर्थात खिजड़े का उल्लेख मिलता है। वराहमिहिर के अनुसार जिस साल शमीवृक्ष ज्यादा फूलता-फलता है उस साल सूखे की स्थिति का निर्माण होता है। जयादशमी के दिन इसकी पूजा करने का एक तात्पर्य यह भी है कि यह वृक्ष आने वाली कृषि विपत्ती का पहले से संकेत दे देता है जिससे किसान पहले से भी ज्यादा पुरुषार्थ करके आनेवाली विपत्ती से निजात पा सकता है।

वर्षों पहले वराहमिहिर ने सूर्यग्रहण और सोलर तूफान एवं इससे जुड़े स्पॉट का अध्ययन भूकंप की दृष्टि से किया था। सूर्यग्रहण को उन्होंने भूकंप के कारणों में माना था। बाद में अमेरिकी अंतरिक्ष विज्ञान केन्द्र कार्यक्रम ‘नासा’ ने 200 से ज्यादा भूकंपों पर किये अनुसंधान के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि सूर्यग्रहण भूकम्प के महत्वपूर्ण कारणों में है।

जॉन बेकर एक व्यावसायिक ‘डोउजर’ है जो इसी तकनिकी का इस्तेमाल कर भूमिगत पानी के स्त्रोतों का पता लगते है | ये विडियो देखिये

क्या कहते है आप ? अद्भुत  है ना हमारा प्राचीन विज्ञान !!